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Friday, 27 July 2012

मुकद्दर नहीं देखा॥

निगला है जिसको भूख ने वो घर नहीं देखा।
इफ्लास का तुमने अभी अजगर नहीँ देखा॥
आँखों ने मेरी, जोगियोँ के भेष मेँ यहाँ,
शैतान ही देखे हैं, पैगम्बर नहीं देखा॥
तुम न समझ सकोगे, गम ए जिँदगी क्या है ?
तुमने किसी के दर्द मेँ ढलकर नहीँ देखा॥
खाता रहा मैँ ठोकरेँ दुनिया मेँ इसलिये;
क्योँकि मैँने कभी सर को झुकाकर नहीँ देखा॥
होठोँ की हंसी सबने देखी मगर;
आँखोँ मेँ छुपा गम का समंदर नहीँ देखा॥
पढ़ता रहा मैं औरों के हाथों की लकीरेँ;
अपना ही कभी मैंन मुकद्दर नहीं देखा॥

-आशीष शर्मा

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