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Tuesday, 24 July 2012

जुगराफ़िया

जुगराफ़िया


शांतिशहर में नहीं पैदा हुई थी।गाँव में पैदा हुई थी। जन्मलेने के पाँच साल बाद तक भीउसने शहर नहीं देखा था। उसकागाँव ही उसकी सम्पूर्ण दुनियाथा। जो चीज़ गाँव में थी वहीउसकी दुनिया में थी और जो चीज़गाँव में नहीं थी वो दुनियामें भी नहीं थी। गाँव में किसीके भी आँगन में गुलाब का फूलनहीं होता था इसलिए शांति केलिए दुनिया में गुलाब का फूलनहीं होता था। इसी तरह आईसक्रीमऔर टीवी जैसी चीज़े जो गाँवके दृश्य में कहीं उपस्थितनहीं थे, वो भी उसकीदुनिया का हिस्सा नहीं थे।इसलिए पूरे पाँच साल तक गुलाब,आईसक्रीम और टीवी सेख़ाली दुनिया मे रहने के बादशांति जब शहर गई तो उसकी दुनियाबदल गई।

शहरमें गुलाब, आईसक्रीम,और टीवी के अलावा भीबहुत कुछ ऐसा था जो शांति नेकभी नहीं देखा था। शहर मेंनज़र के ठहरने का कोई ठिकानाही नहीं था। इतनी चीज़े होतीदेखने को कि नज़र लगातार भटकतीरहती। वो जितनी देर जागतीरहती, हर नई चीज़को फटी-फटी आँखोंसे ताकती रहती। सारी नई चीज़ेउसकी आँखों के रास्ते अन्दरचली जातीं। और जब शांति सोतीतो अन्दर आईं नई चीज़े उसकीदुनिया में रात भर खलबली मचातीरहतीं। कुछ तोड़-फोड़भी करतीं पर बहुत ज़्यादा नहींक्योंकि शांति की दुनिया मेंबहुत सारी ख़ाली जगह थी। उसकीदुनिया में बहुत सारी ख़ालीजगह थी क्येंकि गाँव में बहुतसारी ख़ाली जगह थी।

गाँवमें जब शांति घर से बाहर निकलतीऔर किसी भी एक दिशा में चलतीतो बहुत देर तक उस दिशा मेंचलते रहने पर भी उस दिशा काअंत नहीं होता था। गाँव केबाहर में बहुत सारा बाहर था।और इसी तरह गाँव के अन्दर मेंभी बहुत सारा अन्दर था पर बाहरसे कम। जब वो अन्दर आती तो अन्दरभी बाहर की तरह बहुत सारी ख़ालीजगह थी। बहुत सारे लोगों कोअन्दर आ जाने का बाद भी घर भरतानहीं था। मुर्गी, कुत्ते,चूहे, बिल्लीऔर गाय के अन्दर आ जाने पर भीनहीं। घर का मतलब था मिट्टीकी दीवारों के बीच की और खपरैलके छप्पर के नीचे की ख़ालीजगह। जिसमें खाट, बिछौना,बरतन, घड़ा,अनाज और तेल की ढिबरीजैसी चीज़ें रखी जा सकें।

गाँवमें चीज़ें कम थीं। और उन परभरोसा किया जा सकता था। पेड़अपनी जगह रहता था, तालाबअपनी जगह, घूरा अपनीजगह और सबके घर अपनी जगह पर।सूप खूंटी पर ही होता, रस्सीकुँए की घिर्री पर ही रहती,और उपले दीवार पर ही।वो चलती और बदलती नहीं थी औरऔर अगर वो चलती और बदलती भी तो भी तो इतना धीरे जैसे कि मौसमबदलता है। शांति ने पाया किशहर में ऐसा नहीं था। शहर मेंकुछ तय नहीं था कि कौन सी चीज़कब कहाँ चली जाएगी और कब क्याशकल ले लेगी। कल तक सड़क परजहाँ पेड़ था, कलवहाँ खम्बा हो सकता है। जहाँघर था, वहाँ मैदानहो सकता है। और जहाँ मैदान था,वहाँ ऊँची दीवार होसकती है। किसी के घर के अन्दरजहाँ भगवान थे, वहाँटीवी हो सकता है। जहाँ टीवीथा, वहाँ बिस्तर होसकता है और जहाँ बिस्तर था,वहाँ कल को बाथरूम होसकता है।

एकबार तो ऐसा भी हुआ कि शांति केघर के सामने जो घर था वो घर तोरहा पर जिन लोगों का घर था वोलोग ही नहीं रहे। शांति के लिएवह बहुत ही सन्न कर देने वालीघटना रही। वो बार-बारउस घर के दरवाजे पर पड़े तालेको देखती और फिर भी मान नहींपाती कि वो लोग सचमुच अपना घरछोड़कर चले गए। कुछ दिनों बादजब उसने इस दरवाजे को खुलादेखा तो वो बेहिचक उस घर मेंअन्दर तक दौड़ गई। पर अन्दरतो कोई और ही लोग थे। और अन्दरजो घर उसे दिखा वो घर भी कोईऔर ही घर था। दीवारें और छतवही थे पर सामान अलग था। वोलोग और सामान मिलकर उसके अन्दरफिर से एक खलबली पैदा कर रहेथे। शांति के भीतर की दुनियामें उस घर का जो जुगराफ़ियाथा, वो बाहर केजुगराफ़िये से टकरा कर बहुतदिनों तक अजीब उलझन पैदा करतारहा।

औरबाद में जब ख़ुद शांति के पापाको अपना घर बदलना पड़ा तब तोहालत और भी विकट हो गई। यह बातउसे बड़ी कठिनाई से समझ आई किघर भी किराए पर लिया और दियाजाता है। घर बदलने के बाद भीलम्बे समय तक वो पहले वाले एककमरे के घर को ही घर कहती औरवहीं चलने की ज़िद करती। शांतिके मम्मी-पापा समझदारथे- उनको ऐसी कोईतक़लीफ़ नहीं थी। वो उसे कईतरह से लुभाते और समझाते किदेखो ये घर अधिक बड़ा है,रौशनीदार है।

धीरे-धीरेशांति भी समझदार हो गई। पुरानेदोस्तों को आसानी से भूलनासीख गई। और जल्दी से नए दोस्तबनाना भी सीख गई। और जो चीज़पहले उसके भीतर बहुत उलझन पैदाकरती थी, उसी बातमें उसे दिलचस्पी पैदा हो गई।वो जब भी किसी के घर जाती तोउस घर के रहने वालों से मिलनेजाती और उस घर से भी मिलने जाती।एक जैसे मकान होने पर भी कोईदो घर एक जैसे नहीं होते। हरघर अलग होता। वैसे ही जैसे हरआदमी के नाक-कान-मुँहहोता है फिर भी हर आदमी अलगहोता है।

शांतिको किसी के घर के भीतर जाना उसव्यक्ति के भीतर प्रवेश करनेजैसा लगता। शांति को लगता जैसेघर के अन्दर कई लोग रहते हैंवैसे ही व्यक्ति के अन्दर भीकई लोग रहते हैं। शांति ने यहभी पाया कि हर बार हर घर कुछबदल जाता है वैसे ही जैसे हरबार हर आदमी भी थोड़ा सा बदलजाता है। शांति के लिए किसीके घर जाना लगभग उससे हाथ मिलानेऔर दोस्ती करने जैसा था। रहस्यमयलोग अपने घर के दरवाजे हमेशाबंद रखते। शांति जिनसे दोस्तीकरना चाहती, उन्हेघर बुलाती और उन्हे अपना कमराज़रूर दिखाती। सिर्फ़ उन्हीलोगों के लिए उसके दरवाजे बंदरहते जिन्हे वो पसन्द नहींकरती।

शांतिकी यह दिलचस्पी शादी के पहलेतक क़ायम रही। पर अब वो दिननहीं रहे। अब लोग एक-दूसरेके घर नहीं आते-जाते।जाते भी हैं तो शालीनता सेलिविंग रूम में गुफ़्तगू करतेहैं और लौट आते हैँ। लिविंगरूम की बनावट से आदमी की बनावटभर का ही पता चलता है और कुछनहीं। अधिकतर लोग बाहर कहींमिलने लगे हैं। और वो जगहेंऐसी हैं जिनमें उनकी कोई निजतानहीं झलकती। शांति के लिए यहएक नई उलझन बन गई है। शांति कोलगने लगा है कि वो किसी को नहींपहचानती। कौन कैसा है, कुछभी नहीं जानती।
 
Note--This story was published in DAINIK BHASKAR oo this sunday on 22 july, 2012

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